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रणछोड़ पगी का जीवन परिचय | Ranchhod Pagi Biography history In Hindi

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हाल ही में रिलीज हुई हिंदी फिल्म ‘भुज- द प्राइड ऑफ इंडिया’ (Bhuj – The Pride Of India) असल में ‘प्राइड ऑफ गुजरात’ के नाम से मशहूर रणछोड़ पगी (रणछोड़दास रबारी) ​​ की वीर गाथा है। रणछोड़ रबारी ने रेगिस्तान में पेरो को परखने कि हुन्नर से भारतीय सेना की कई बार मदद की। पगी कि निपुणता के कारण बार-बार हार से निराश पाकिस्तान ने भी उसके सिर के लिए 50,000 रुपये के इनाम की घोषणा कर दि थी ।

रणछोड़दास पगी का जीवन परिचय

नाम रणछोड़दास रबारी
प्रचलित​ नाम रणछोड़ पगी
जन्म तारिख​  1901
जन्म स्थान पेथापुर ग​ढडो (पाकिस्तान)
पिता का नाम सावाभाई
माता का नाम नाथीमा
पत्नी का नाम सगनाबेन
बच्चे का नाम मादेवभाई और लक्ष्मणभाई  दो बेटे और दो बेटियां
मृत्यु कब हुआ और कहां 17 जनवरी 2013 लिंबाला(वाव तेहसिल -गुजरात​)
पुरस्कार संग्राम पदक, पुलिस पदक और समर​ सेवा स्टार पुरस्कार

उनका जन्म पाकिस्तान के थारपारकर के एक छोटे से गाँव पेथापुर ग​ढडो में हुआ था। उनकी माता का नाम नाथीमा और पिता का नाम सावाभाई था। उन्होंने कम उम्र में ही अपने पिता की छत्र​छाया खो दी थी। उनका पालन-पोषण उनकी मां नाथीमा ने किया था। उनका परिवार पाकिस्तान में बहुत समृद्ध था। रणछोड़ पगी के पास पाकिस्तान में उनके गांव में 300 एकड़ जमीन और 200 से ज्यादा पशु  (गाय, भेड़, बकरी और ऊंट) थे। उनके घर में 20 से 25 आदमी काम कर रहे थे। उनमें से कई लोगो के वारस​ वर्तमान में गुजरात के बनासकांठा जिल्ले के ​थराद तेहसिल मे शिवनगर गांव में रह रहे हैं। 1947 में जब भारत और पाकिस्तान का बंटवारा हुआ था तब वह पाकिस्तान के सिघ प्रांत में रह रहे थे। हालांकि, एक दिन उसने तीन (3) पाकिस्तानी पुलिस कर्मियों को बांध के कोठी डाल  दिया और अपने परिवार और बच्चों के साथ भारत के लिए रवाना हो ग​ए । वे गुजरात के राघानेसड़ा गांव में आकर बस गए । इसके बाद वे अपने मोसाल लिंबाला(वाव तेहसिल -गुजरात​) गांव में बस गए।

रणछोड़ पगी का जीवन परिचय

ऐसा कहा जाता है कि विभाजन के शुरुआती वर्षों में, भारत-पाकिस्तान सिमा पार परिवहन करना उतना मुस्किल नहीं था जितना कि आज है । इसीलिए बंटवारे के बाद कई सालों तक पाकिस्तान से प्रताड़ित हुए लोग सिमा पार करके भारत आते थे। ऐसे कई लोग गुजरात और कच्छ के थरद-वाव पंथक​ में स्थायी रूप से बस गए हैं। सन​ 1965 और सन​ 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में, रणछोड़ पागी ने पाकिस्तानी सेना कि निंद हराम कर दि थी और  लगाकर भारतीय सेना की मदद की।

रणछोड़ पागी एसे हुन्नर वाले व्यक्ति थे जो व्यक्ति के कदमों को देखकर ही बता सकते थे कि वहां कितने लोग होंगे और उनका वजन कितना होगा। यह व्यक्ति एक ऐसा व्यक्ति था जो कच्छ-बनासकांठा के भीतरी इलाके में एक गाँव में रहता था जहाँ आपको दूर दूर से रेत के इलावा और कुछ भी नहीं दिखाई देता ।

रणछोड़ रबारी ने कदमों को समझने की अनूठी कला में महारत हासिल की थी। वे स्वयं गाय-बकरी आदी पालन काम करते थे। रेगिस्तान में खोए हुए पशु (जानवर​) को खोजने के लिए पैरों के निशान की पहचान करने की कला ने उन्हें भारतीय सेना के लिए एक आदर्श बना दिया। 1965 में जब पाकिस्तान ने कच्छ के कुछ इलाकों पर कब्जा कर लिया तो उनका सामना करने पहुंची भारतीय सेना को कोई दिशा नहीं मिल रही थी । उस समय रणछोड़ पगी ने भारतीय सेना को रेगिस्तान से होते हुए एक छोटे लेकिन सुरक्षित रास्ते से सीमा तक पहुँचाया। इस दौरान उसने पैरों के निशान ढूंढ़ लिए और दुर्गम स्थानों में छिपे करीब 1,200 पाकिस्तानी सैनिकों को पकड़वा लिया था। इस घटना के बाद रणछोड़ पगी भारतीय सेना के आदर्श हो गए।

साल​ 1914 में बनासकांठा के पुलिस सुपरिन्टेडेन्ट वनराज सिंह ने 58 वर्ष की आयु में रणछोड़ पगी को सुइगाम थाने में पोलिस पगी के रूप में नियुक्त किया। यह आदमी कदमों को समझने की अनूठी कला में इतना माहिर था कि ऊंट के पैरों के निशान देखकर ही बता सकता था कि उस पर कितने लोग सवार होंगे और वह कितनी दुरी पर पहोचे होगें । 

जब 1971 के युद्ध में पाकिस्तान द्वारा भारी गोलाबारी के बीच भारतीय सेना को भारतीय सेना को हथियार और राशन पहुंचाने में कठिनाई हो रही थी तब​ जनरल सैम मानेकशॉ ने रणछोड़ पागी की मदद मांगी। रेगिस्तान के पारखी रणछोड़ पगी ने पालीनगर चेकपोस्ट के पास एक एडिंगो स्थापित करके रेगिस्तानी क्षेत्र के छोटे रास्तो के माध्यम से भारतीय सेना की आपूर्ति लाइन की स्थापना की। भारतीय सेना के 50 किमी दूर एक अन्य छावणी से, रणछोड़ पगीने  ऊंट पर गोला-बारूद लाकर सेना को सौंप दिया।। रणछोड़भाईने समय पर गोला-बारूद पहुंचासे भारतीय वायु सेना के लड़ाकू विमानों ने धोरा और भालवा स्टेशनों पर कब्जा कर लिया। हालांकि, रणछोड़भाई रबारी खुद ऊंट पर गोला-बारूद पहुंचाते समय घायल हो गए थे। मानेकशॉ को रणछोड़ पगी पर इतना विश्वास था कि वो उन्हे ‘वन मैन आर्मी एट डेजर्ट फ्रंट‘ कहा करते थे ।

1971 के युद्ध में पाकिस्तान की हार के बाद, जनरल सैम मानेकशॉ ने दिल्ली में एक भव्य जीत पार्टी का आयोजन किया जिसमे रणछोड़ पगी को भी आमंत्रित किया । रणछोड पगी को बुलाने के लिए एक हेलिकोप्टर भेजा । लेकिन जैसे ही वह उसमें चढ़े, उनका खाने के सामान कि थेली(लंच बैग) नीचे ही रह गया और  वो थेली के लिये  हेलीकॉप्टर फिर निचे उतारा गया । उस थेली मे रणछोड पगी लाल मिर्च, दो प्याज और बाजरे कि सुखी रोटी ले गए थे ।

सभी को हैरानी तो तब​ हुई जब​ पार्टी के स्वादिष्ट व्यंजन छोड़कर रणछोड पगी घर​ से लाई गई पोटली को छोड़कर रोटी, मिर्च-प्याज खाने बैठ गए । एसा कहा जाता कि उस पार्टी मे जनरल सैम मानेकशॉ ने भी रणछोड पगी के साथ​ प्याज और बाजरे कि सुखी रोटी खाइ थी ।

रेगिस्तानी क्षेत्र में रहने वाले पशुचारक अपने खोए हुए पशु को खोजने के लिए कदमों के आधार पर दिशा निर्धारित करते हैं। रणछोड़ पागी कम उम्र से ही कदमों को पहचानने में सक्षम थे। वे रेगिस्तान की धूल में पड़ी कदमों की गहराई के आधार पर कदम का समय भी बता सकते थे।

एक बार​ भारतीय सेना के अधिकारियों को यह कला समझाते हुए उन्होंने कुछ कदमों को समझाया और बताया कि यहां तीन तरह के पैरोके निशान​ हैं। सबसे बड़े कदम पुरुष के हैं। यह थोड़ा गहरा है और दाईं ओर झुका हुआ है। मतलब उसने अपने सिर पर कुछ वजन उठा लिया है। एक बच्चा और एक महिला भी है। महिला के कदम दाएं-बाएं से थोड़ा तिरछे हैं इसलिए वो  गर्भवती होनी चाहिए। अधिकारियों ने पास के एक गाँव में जाँच की तो वास्तव में एक देहाती परिवार एक गर्भवती महिला के साथ वहाँ से गुजरा था ।

सम्मान:-

भारतीय सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) ने अपनी एक चौकी का नाम ‘रणछोड़दास’ रखा है। वहीं उनकी एक मूर्ति भी लगाई गई है। उन्हें पुलिस और सीमा सुरक्षा बल दोनों ने सम्मानित किया। उन्हें संग्राम पदक, पुलिस पदक और समर​ सेवा स्टार पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 2007 में पालनपुर में स्वतंत्रता दिवस समारोह में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा उन्हें सम्मानित किया गया था।

रणछोड़ पगी का जीवन परिचय

मृत्यु: –

1901 में जन्मे रणछोड़ पगी का 112 साल के लंबे जीवन काल के बाद 17 जनवरी 2013 में निधन हो गया। उनकी अंतिम इच्छा थी कि उनके अंतिम संस्कार के समय उनके सिर पर पगड़ी बांधी जाए और उन्हें उनके खेत में दफना दिया जाए। इसलिए उनकी मर्जी के मुताबिक उनका अंतिम संस्कार किया गया।

उन्होंने सम्मान के प्रतीक के रूप में भारतीय सेना द्वारा दिए गए कोट और पदक को सम्मानपूर्वक संरक्षित किया। अपने द्वारा किए गए महान कार्य पर उन्हें बिल्कुल भी अभिमान​ नहीं था। उनके बेटे और पोते भी पुलिस बल के अलावा भारतीय सेना में सेवारत हैं।

मुझे उम्मीद है कि आपको रणछोड़ पगी की जीवनी पर हमारा लेख पसंद आया होगा। ऐसे महान व्यक्तियों के जीवन की रोचक जानकारी हम अपने ब्लॉग पर  प्रकाशित करते रहेंगे। अगर आपको वास्तव यह लेख उपयोगी लगा, तो इसे अपने दोस्तों के साथ share करना न भूलें। आपके लाइक, कमेंट और शेयर हमें और अधिक लिखने और आपको नई जानकारी प्रदान करने के लिए प्रेरित करते हैं। अगर आप  रणछोड़ पगी के बारे में गुजराती में पढ़ना चाहते हैं तो यहां क्लिक करके पढ़ सकते हैं।

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